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शान्ति पर्व
अध्याय २९५
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वसिष्ठ उवाच
तदाक्षरत्वं प्रकृतिर्गच्छते गुणसञ्ज्ञिता |  १७   क
निर्गुणत्वं च वैदेह गुणेषु प्रतिवर्तनात् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति