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वन पर्व
अध्याय २९४
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं वहुविधैर्वाक्यैर्याच्यमानः स तु द्विजः |  ७   क
कर्णेन भरतश्रेष्ठ नान्यं वरमय़ाचत ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति