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शान्ति पर्व
अध्याय २९४
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वसिष्ठ उवाच
न त्वेवं वर्तमानानामावृत्तिर्विद्यते पुनः |  ४६   क
विद्यतेऽक्षरभावत्वादपरस्परमव्ययम् ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति