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शान्ति पर्व
अध्याय २९४
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वसिष्ठ उवाच
निवाते च यथा दीप्यन्दीपस्तद्वत्स दृश्यते |  १८   क
निरिङ्गश्चाचलश्चोर्ध्वं न तिर्यग्गतिमाप्नुय़ात् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति