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शान्ति पर्व
अध्याय २९२
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वसिष्ठ उवाच
तिर्यग्योनौ मनुष्यत्वे देवलोके तथैव च |  ४१   क
त्रीणि स्थानानि चैतानि जानीय़ात्प्राकृतानि ह ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति