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द्रोण पर्व
अध्याय २९
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सञ्जय़ उवाच
तावेकरथमारूढौ भ्रातरौ वृषकाचलौ |  ८   क
शरवर्षेण वीभत्सुमविध्येतां पुनः पुनः ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति