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वन पर्व
अध्याय २९
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प्रह्लाद उवाच
क्षमाकालांस्तु वक्ष्यामि शृणु मे विस्तरेण तान् |  २४   क
ये ते नित्यमसन्त्याज्या यथा प्राहुर्मनीषिणः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति