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शान्ति पर्व
अध्याय २९
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वैशम्पाय़न उवाच
रन्तिदेवं च साङ्कृत्यं मृतं शुश्रुम सृञ्जय़ |  ११३   क
सम्यगाराध्य यः शक्रं वरं लेभे महाय़शाः ||  ११३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति