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शान्ति पर्व
अध्याय २८७
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पराशर उवाच
मृन्मय़े भाजने पक्वे यथा वै न्यस्यते द्रवः |  २३   क
तथा शरीरं तपसा तप्तं विषय़मश्नुते ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति