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वन पर्व
अध्याय २८४
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वैशम्पाय़न उवाच
कवचेन च संय़ुक्तः कुण्डलाभ्यां च मानद |  १९   क
अवध्यस्त्वं रणेऽरीणामिति विद्धि वचो मम ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति