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शान्ति पर्व
अध्याय २८४
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पराशर उवाच
एवं तस्य प्रवृत्तस्य नित्यमेवानुपश्यतः |  ४   क
रागद्वेषौ विवर्धेते ह्यनित्यत्वमपश्यतः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति