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वन पर्व
अध्याय २८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
चतुर्वर्षशतं चाय़ुस्त्वय़ा सार्धमवाप्स्यति |  ५६   क
इष्ट्वा यज्ञैश्च धर्मेण ख्यातिं लोके गमिष्यति ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति