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वन पर्व
अध्याय २८१
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सावित्र्यु उवाच
विवस्वतस्त्वं तनय़ः प्रतापवां; स्ततो हि वैवस्वत उच्यसे वुधैः |  ४०   क
शमेन धर्मेण च रञ्जिताः प्रजा; स्ततस्तवेहेश्वर धर्मराजता ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति