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वन पर्व
अध्याय २८०
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मार्कण्डेय़ उवाच
निरीक्षमाणा भर्तारं सर्वावस्थमनिन्दिता |  ३२   क
मृतमेव हि तं मेने काले मुनिवचः स्मरन् ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति