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वन पर्व
अध्याय २८०
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सत्यवानु उवाच
यदि ते गमनोत्साहः करिष्यामि तव प्रिय़म् |  २२   क
मम त्वामन्त्रय़ गुरून्न मां दोषः स्पृशेदय़म् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति