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शान्ति पर्व
अध्याय २८०
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पराशर उवाच
मनोरथरथं प्राप्य इन्द्रिय़ार्थहय़ं नरः |  १   क
रश्मिभिर्ज्ञानसम्भूतैर्यो गच्छति स वुद्धिमान् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति