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शल्य पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
तस्य ते शिरसा गृह्य वचनं युद्धदुर्मदाः |  ९   क
प्रत्युद्ययू रणे पार्थांस्तव पुत्रस्य शासनात् ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति