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शल्य पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तदा वर्तमाने विद्रवे भृशदारुणे |  ७५   क
युय़ुत्सुः शोकसंमूढः प्राप्तकालमचिन्तय़त् ||  ७५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति