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शल्य पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्ह्रदं प्रविष्टे तु त्रीन्रथाञ्श्रान्तवाहनान् |  ५३   क
अपश्यं सहितानेकस्तं देशं समुपेय़ुषः ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति