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शल्य पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
एवं विचिन्तय़ानस्तु प्रविविक्षुर्ह्रदं नृपः |  २८   क
दुःखसन्तप्तहृदय़ो दृष्ट्वा राजन्वलक्षय़म् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति