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शल्य पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
नर्दमानान्परांश्चैव स्ववलस्य च सङ्क्षय़म् |  २४   क
हतं स्वहय़मुत्सृज्य प्राङ्मुखः प्राद्रवद्भय़ात् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति