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अनुशासन पर्व
अध्याय २८
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मतङ्ग उवाच
वरं ददानि ते हन्त वृणीष्व त्वं यदिच्छसि |  २४   क
यच्चाप्यवाप्यमन्यत्ते सर्वं प्रव्रूहि माचिरम् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति