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वन पर्व
अध्याय २७८
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राजो उवाच
अपीदानीं स तेजस्वी वुद्धिमान्वा नृपात्मजः |  १४   क
क्षमावानपि वा शूरः सत्यवान्पितृनन्दनः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति