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वन पर्व
अध्याय २७६
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मार्कण्डेय़ उवाच
मा शुचः पुरुषव्याघ्र क्षत्रिय़ोऽसि परन्तप |  २   क
वाहुवीर्याश्रय़े मार्गे वर्तसे दीप्तनिर्णय़े ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति