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वन पर्व
अध्याय २७५
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तीरे समुद्रस्य यत्र शिश्ये स पार्थिवः |  ५३   क
तत्रैवोवास धर्मात्मा सहितः सर्ववानरैः ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति