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शान्ति पर्व
अध्याय २७४
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भीष्म उवाच
शार्दूलेष्वथ धर्मज्ञ श्रमो ज्वर इहोच्यते |  ५४   क
मानुषेषु तु धर्मज्ञ ज्वरो नामैष विश्रुतः |  ५४   ख
मरणे जन्मनि तथा मध्ये चाविशते नरम् ||  ५४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति