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शान्ति पर्व
अध्याय २७३
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अग्निरु उवाच
मम मोक्षस्य कोऽन्तो वै व्रह्मन्ध्याय़स्व वै प्रभो |  ३०   क
एतदिच्छामि विज्ञातुं तत्त्वतो लोकपूजित ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति