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वन पर्व
अध्याय २७२
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मार्कण्डेय़ उवाच
स राममुद्दिश्य शरैस्ततो दत्तवरैस्तदा |  २१   क
विव्याध सर्वगात्रेषु लक्ष्मणं च महारथम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति