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शान्ति पर्व
अध्याय २७२
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युधिष्ठिर उवाच
कथं विनिहतो वृत्रः शक्रेण भरतर्षभ |  ४   क
धर्मिष्ठो विष्णुभक्तश्च तत्त्वज्ञश्च पदान्वय़े ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति