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शान्ति पर्व
अध्याय २७२
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महेश्वर उवाच
एतद्वै मामकं तेजः समाविशति वासव |  ३८   क
वृत्रमेनं त्वमप्येवं जहि वज्रेण दानवम् ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति