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शान्ति पर्व
अध्याय २७२
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वसिष्ठ उवाच
एष लोकगुरुस्त्र्यक्षः सर्वलोकनमस्कृतः |  २५   क
निरीक्षते त्वां भगवांस्त्यज मोहं सुरेश्वर ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति