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शान्ति पर्व
अध्याय २७२
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भीष्म उवाच
ततोऽन्तरिक्षमावृत्य वृत्रो धर्मभृतां वरः |  १८   क
अश्मवर्षेण देवेन्द्रं पर्वतात्समवाकिरत् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति