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शान्ति पर्व
अध्याय २७२
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भीष्म उवाच
शक्रस्य तु तदा राजन्नूरुस्तम्भो व्यजाय़त |  १०   क
भय़ाद्वृत्रस्य सहसा दृष्ट्वा तद्रूपमुत्तमम् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति