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शान्ति पर्व
अध्याय २७०
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वृत्र उवाच
इतीदमुक्तः स मुनिस्तदानीं; प्रत्याह यत्तच्छृणु राजसिंह |  ३४   क
मय़ोच्यमानं पुरुषर्षभ त्व; मनन्यचित्तः सह सोदरीय़ैः ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति