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शान्ति पर्व
अध्याय २७०
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वृत्र उवाच
गन्धानादाय़ भूतानां रसांश्च विविधानपि |  २५   क
अवर्धं त्रीन्समाक्रम्य लोकान्वै स्वेन तेजसा ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति