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शल्य पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
तस्याशुकारी सुसमाहितेन; सुवर्णपुङ्खेन दृढाय़सेन |  ५७   क
भल्लेन सर्वावरणातिगेन; शिरः शरीरात्प्रममाथ भूय़ः ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति