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शल्य पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
तं भीमसेनः समरे विव्याध निशितैः शरैः |  २७   क
शकुनिं च चतुःषष्ट्या पार्श्वस्थांश्च त्रिभिस्त्रिभिः ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति