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विराट पर्व
अध्याय २७
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वैशम्पाय़न उवाच
युधिष्ठिरे समासक्तां धर्मज्ञे धर्मसंश्रिताम् |  ३   क
असत्सु दुर्लभां नित्यं सतां चाभिमतां सदा |  ३   ख
भीष्मः समवदत्तत्र गिरं साधुभिरर्चिताम् ||  ३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति