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अनुशासन पर्व
अध्याय २७
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सिद्ध उवाच
लोकानिमांस्त्रीन्यशसा वितत्य; सिद्धिं प्राप्य महतीं तां दुरापाम् |  ९९   क
गङ्गाकृतानचिरेणैव लोका; न्यथेष्टमिष्टान्विचरिष्यसि त्वम् ||  ९९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति