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अनुशासन पर्व
अध्याय २७
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सिद्ध उवाच
दक्षां पृथ्वीं वृहतीं विप्रकृष्टां; शिवामृतां सुरसां सुप्रसन्नाम् |  ८५   क
विभावरीं सर्वभूतप्रतिष्ठां; गङ्गां गता ये त्रिदिवं गतास्ते ||  ८५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति