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अनुशासन पर्व
अध्याय २७
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सिद्ध उवाच
भवन्ति निर्विषाः सर्पा यथा तार्क्ष्यस्य दर्शनात् |  ४३   क
गङ्गाय़ा दर्शनात्तद्वत्सर्वपापैः प्रमुच्यते ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति