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अनुशासन पर्व
अध्याय २७
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सिद्ध उवाच
तव मम च गुणैर्महानुभावा; जुषतु मतिं सततं स्वधर्मय़ुक्तैः |  १००   क
अभिगतजनवत्सला हि गङ्गा; भजति युनक्ति सुखैश्च भक्तिमन्तम् ||  १००   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति