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वन पर्व
अध्याय २६८
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततः प्रत्यवहारोऽभूत्सैन्यानां राघवाज्ञय़ा |  ४०   क
कृते विमर्दे लङ्काय़ां लव्धलक्षो जय़ोत्तरः ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति