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वन पर्व
अध्याय २६८
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तु राजवचनाद्राक्षसाः कामरूपिणः |  ३२   क
निर्ययुर्विकृताकाराः सहस्रशतसङ्घशः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति