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शान्ति पर्व
अध्याय २६८
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भीष्म उवाच
अर्थाः खलु समृद्धा हि वाढं दुःखं विजानताम् |  ५   क
असमृद्धास्त्वपि सदा मोहय़न्त्यविचक्षणान् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति