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शान्ति पर्व
अध्याय २६८
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भीष्म उवाच
सुसुखं वत जीवामि यस्य मे नास्ति किञ्चन |  ४   क
मिथिलाय़ां प्रदीप्ताय़ां न मे दह्यति किञ्चन ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति