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वन पर्व
अध्याय २६७
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मार्कण्डेय़ उवाच
प्रतिपन्नौ यदा रूपं राक्षसं तौ निशाचरौ |  ५३   क
दर्शय़ित्वा ततः सैन्यं रामः पश्चादवासृजत् ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति