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वन पर्व
अध्याय २६७
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मार्कण्डेय़ उवाच
तत्रस्थं स तु धर्मात्मा समागच्छद्विभीषणः |  ४६   क
भ्राता वै राक्षसेन्द्रस्य चतुर्भिः सचिवैः सह ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति