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वन पर्व
अध्याय २६७
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मार्कण्डेय़ उवाच
केचिन्नौभिर्व्यवस्यन्ति केचीच्च विविधैः प्लवैः |  २६   क
नेति रामश्च तान्सर्वान्सान्त्वय़न्प्रत्यभाषत ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति