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वन पर्व
अध्याय २६६
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मार्कण्डेय़ उवाच
नाध्यवस्यद्यदा कश्चित्सागरस्य विलङ्घने |  ५७   क
ततः पितरमाविश्य पुप्लुवेऽहं महार्णवम् |  ५७   ख
शतय़ोजनविस्तीर्णं निहत्य जलराक्षसीम् ||  ५७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति